Sunday, January 10, 2016

Belief



" माना उसे  तो मंदिर , ना माना तो मक़बरा बना दिया !!
कभी दी आसमानी बादशाहत , तो कभी सूली चढ़ा दिया !!
डूबा था जो नूरानी मद् में , क्यों कर उसे विश का प्याला पिला दिया !!
वाणी को उसकी माना , तो कभी सर क़लम करा दिया
अरे , वो तो जोगी है, फ़क़ीर है,
बाँधे ना उसके क़दम , कोई लक्षमन की लकीर है !!
बहता है जो मस्त दरिया की तरह , 
समाया है क्या कर कभी वो , इक कलश में भला ?? " 

अब पूछोगे तुम मुझसे , कि किसका बंया करता हूँ , 
नाम है क्या , जिसके नज़र मैं यह अाशार करता हूँ ?
है जो संमनदर से भी गहरा , और इस फलक से भी दूर तलक फैला,
दो लफ़्ज़ों में भला क्या उसे मैं क़ैद कर सकता हूँ ? 

- नूपुर (Noopur)